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Showing posts from May, 2021

ईदगाह - मूंशी प्रेमचंद

 रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जायगी। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लौटना असम्भव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गयी। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी की चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है या नहीं, ...

जागो प्यारे

उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लायी हूँ मुंह धो लो। बीती रात कमल दल फूले, उसके ऊपर भँवरे झूले। चिड़िया चहक उठी पेड़ों पे, बहने लगी हवा अति सुंदर। नभ में प्यारी लाली छाई, धरती ने प्यारी छवि पाई। भोर हुई सूरज उग आया, जल में पड़ी सुनहरी छाया। नन्ही नन्ही किरणें आई, फूल खिले कलियाँ मुस्काई। इतना सुंदर समय मत खोओ, मेरे प्यारे अब मत सोओ।

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

 तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार आज सिन्धु ने विष उगला है लहरों का यौवन मचला है आज हृदय में और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार लहरों के स्वर में कुछ बोलो इस अंधड में साहस तोलो कभी-कभी मिलता जीवन में तूफानों का प्यार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार यह असीम, निज सीमा जाने सागर भी तो यह पहचाने मिट्टी के पुतले मानव ने कभी न मानी हार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार सागर की अपनी क्षमता है पर माँझी भी कब थकता है जब तक साँसों में स्पन्दन है उसका हाथ नहीं रुकता है इसके ही बल पर कर डाले सातों सागर पार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

पुष्प की अभिलाषा

 चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ, चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ, चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ, चाह नहीं देवों के सिर पर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ, मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक! मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने, जिस पथ पर जावें वीर अनेक!

चल रे मटके टम्मक टूँ

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक  चलती थी लाठी को टेक  उसके पास बहुत था माल  जाना था उसको ससुराल  मगर राह में चीते शेर  लेते थे राही को घेर  बुढ़िया ने सोंची तदबीर  जिससे चमक उठी तक़दीर  मटका एक मंगाया मोल  लंबा लंबा गोल मटोल  उसमे बैठी बुढ़िया आप  वह ससुराल चली चुपचाप  बुढ़िया गाती जाती यूँ  चल रे मटके टम्मक टूँ

अब्बू खां की बकरी

  हिमालय पहाड़ पर अल्मोड़ा नाम की एक बस्ती है। उसमें एक बड़े मियाँ रहते थे। उनका नाम था अब्बू खाँ। उन्हें बकरियाँ पालने का बड़ा शौक था। बस एक दो बकरियाँ रखते, दिन भर उन्हें चराते फिरते और शाम को घर में लाकर बाँध देते। अब्बू गरीब थे और भाग्य भी उनका साथ नहीं देता था। उनकी बकरियाँ कभी-न-कभी रस्सी तुड़ाकर भाग जाती थीं। पहाड़ पर एक भेड़िया रहता था। वह उन्हें खा जाता था। मगर अजीब बात है कि न अब्बू खाँ का प्यार, न शाम के दाने का लालच और न भेड़िये का डर उन्हें भागने से रोकता। हो सकता है, ये पहाड़ी जानवर अपनी आजादी से इतना अधिक प्यार करते हों कि उसे किसी कीमत पर बेचने के लिए तैयार न हों।       जब भी कोई बकरी भाग जाती, अब्बू खाँ बेचारे सिर पकड़कर बैठ जाते। हर बार यही सोचते कि अब से बकरी नहीं पालूँगा। मगर अकेलापन बुरी चीज है। थोड़े दिन तक तो वे बिना बकरियों के रह लेते, फिर कहीं से एक बकरी खरीद लाते।       इस बार वे जो बकरी खरीद कर लाए थे, वह बहुत सुंदर थी। उसके बाल सफेद थे। काले-काले सींग भी बड़े खूबसूरत थे। सीधी इतनी थी कि चाहे तो कोई बच्चा दुह ले। अब्ब...